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क्यूँ ढूँढता है जो नहीं है..

क्यूँ ढूँढता है जो नहीं है
क्यूँ ढूँढता नहीं जो यहीं कहीं है

क्यूँ सोचता रहता है उन लम्हों को
क्यूँ जीना चाहता है फिर से उन पलों को

जहाँ तू क़त्ल हुआ करता था कभी
जिन लम्हों में तेरा मैं मरता था कभी

क्यूँ ढूँढता है जो नहीं है
क्यूँ ढूँढता नहीं जो यहीं कहीं है



क्यूँ लिखना चाहता है फिर से वो आवाज़
क्यूँ तेरी रूह डूब जाने को ढूंढती है फिर से वो साज़

जब के तेरी आवाज़ को नहीं मिले वो पल
जिन पलों में ढूँढता रहता था तू अपना कल

क्यूँ ढूँढता है वो कल, क्यूँ देखना चाहता है
अभी भी उसमें अपना आने वाला कल

क्यूँ ढूँढता नहीं उस कल को अपने आज में
क्यूँ जीता नहीं अपने आज को, अपनी आवाज़ को

क्यूँ ढूँढता है वो जो नहीं है
क्यूँ ढूँढता नहीं वो जो यहीं कहीं है..

©/IPR: Santosh Chaubey - http://severallyalone.blogspot.com/
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