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दो दरख्तों के दरम्यान


दो दरख्तों के दरम्यान 
जिंदगी ये निकलती रही 
कभी मुझसे कभी तुमसे 
ये वही कहती रही 
जो कभी तुमने कहा, कभी मैंने सुना  
जो कभी मैंने कहा, कभी तुमने सुना 
हम फिर भी क्यूँ ना रुके, क्यूँ ना झुके 
जीवन की रेत तो बहती ही रही 
दो दरख्तों के दरम्यान 
जिंदगी ये क्या ढूंढती रही 
वो सुरमयी शाम जो कभी आने को थी
आने से पहले ही क्यूँ ढल चली
यादों के लमहे, वो बातों की चादर
वो मेरे जीवन की पहली कहानी 
खोना भी खुद को लगा गहरा पानी
चादर वो तंग कब हो चली
धागे सुरों के बदलने लगे
अनजानी गलियों से मिलते गए
शब्दों से शब्दों का नाता,
टूटा कभी, कभी फिर से जुड़ा
दरख्तों की डालों का वो खालीपन
चला ढूँढने फिर से जीवन की धूप
वो खोना वो पाना वो खुद से झगड़ना 
यादों की चादर ने साया किया
क्या हुआ के पाया फिर से तुम्हारा ही रूप
दरख्तों के पाए और गहरे हुए
सुरों के मौसम में जीवन की धुन
दरख्तों से होके गुनगुनाने लगी
सुरों के वो धागे, शब्दों के साज़
डालों को मिली फिर से मेरी आवाज़
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