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जिंदगी तेरे आगोश में

जिंदगी की पनाहों में
गुम होती धुंधली राहों में
मन, न जाने क्यूँ,
भटकता रहा
ख्यालों के अर्श पर
फिसलता रहा
राहें कभी पास तो,
कभी दूर होती रहीं
राही तो पर,
बेगाने ही रहे
खुद को बताते अनजाने ही रहे
जाना या न आना
सोचना फिर बेपरवाह हो जाना
खोना या पाना,
न मैंने जाना,
न तुमने पहचाना
पर,
न जाने क्यूँ,
हम, फिर भी तो चलते ही रहे
कभी तुमने कहा,
कभी मैंने सुना
टूटे हुए हैं जिंदगी से तो क्या
सोचा है तो जाना है
उस पार,
जहाँ,
जुड़ पाएंगी ये टूटी कड़ियाँ
फिर से,
जिंदगी तेरे आगोश में
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