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रास्तों का क्या है..

उस रास्ते से फिर जो गुजरा, न जाने किस उधेड़बुन में था
के फिर से वो पुकार सुनी, जबके कुछ भी नहीं था
ये जानते हुए भी के सब खो चुका था
रास्ते से गुजरती हुई वो गलियां, उनका वो किलोल
वो दो पल का भटकाव, अनायास ही तो नहीं था
रास्तों और रिश्तों की अजीब सी परिचित कहानी है
एक अंश इंतज़ार का अपने पथ पर छोड़ जाने की
उन्हें पता है के कोई हारा हुआ शख्स
फिर आएगा गलियों में, उन रास्तों की डोर पकड़ने
जिस पर वो चला था किसी अंश की पूर्णता को ढूँढने
क्या होगा जो फिर से गलियों के चौक आबाद होंगे
बैठकें होंगी किसी को छले जाने कीमत पर
कुछ बातों का बाज़ार सजेगा क्यूंकि,
दुनिया के तौर-तरीकों में सब कुछ स्वीकार्य है
क्या हुआ जो कोई ठिठका रहा, रुक गया
किसी अपरिचित से मोड़ पर
किसी खोते हुए रास्ते का मोड़ पाने के लिए
किसी सांस जाते हुए रिश्ते को बचाने के लिए
रास्तों का क्या है, रिश्तों से कैसे पूछें
अलग-अलग पैमानों की कीमत पर,
रास्ते और रिश्ते यूँ ही चलते रहेंगे
कुछ रुकेंगे, कुछ चल देंगे,
अपने वजूद को तलाशते,
सार्थक-निरर्थक विमर्शों में
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