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अब तो मंजिल ही फ़ना लगती है

ना सरेशाम अब तेरा नाम लेते हैं
लाख मनाये कोई,
खुद से ही काम लेते हैं
सर्द जुबां से क्या कहें
बेजुबां ही सिमट लेते है
राहें जो देखी थीं,
सोचना भी अब मुहाल लगता है
जिक्र कभी जो लम्हों का था,
ता-उम्र का सफ़र अब लगता है
कभी वक़्त से भी पार होते थे,
अब लम्हों से ही नाता लगता है
क्या हुआ, कब हुआ, क्यूँ हुआ
कौन सुनेगा, क्यूँ सुनाएं
आरज़ू थी कभी तो राह मिलेगी,
अब तो मंजिल ही फ़ना लगती है
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