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नश्तर को एक तकरीब ही चाहिए

यासो-उम्मीद है क्या, राहें कभी रहबर न थीं
गुमां तो न था पर, आहें कभी कमतर न थीं
क्या बेसबब ख्यालों की दुनिया कभी हमवर भी थी
सदा वो कहीं खो गयी जो कभी बेखबर न थी
नश्तर को एक तकरीब ही चाहिए निगहबर होने को
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