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जो बशर ही बिफरा

खाली ये भी लम्हा जो चश्मे-तर से होकर दर-ब-दर गुजरा
आशुफ़्तगी ने फुर्सत के माहो-साल का जो यूँ किया माजरा
तूफाने-हवादिस ऐसा ठहरा रउनत का का फ़िर गया जर्रा
जीने-मरने का क्या वुजूदो-अदम कहें जो बशर ही बिफरा
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