Latest

क्या ये भी यूँ ही आये थे?

वक़्त को हथकड़ियाँ पहनाने वाले
फौलादी खंजर के कर कितने
पत्ते से झड़ गए
डालों पर औंधे मुंह
लटक रही सांसो के
फडफडाते पंख रहे कितने!

समय के आईने में
अनगिनत चेहरे
उभरे थे मिट भी गए
धूप में तप कर
बरसात की बूंदों से,
छहर छहर आँखों से
बरस गए ।

कुछ थे,
जो रुक गए,
जो ठहर गए
पर,
जब जोड़ने बैठे घड़ियाँ
तो पाया,
क्या ये भी यूँ ही आये थे?
  • Comments Desabled By Webmasters

banarascalling Shared by Themes24x7 Copyright © 2014

Powered by Blogger.