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अंतर का शोर कहीं ज्यादा है

ब्रह्मा शंकर पाण्डेय, १९७४

आहिस्ते बोलो,
बहरे नहीं, सुन लेंगे कान,
पांवों की आहट पकड़ते हैं।
सदियों से शब्दों के ढेले खा
उखड़े हैं, अटके हैं
किसी तरह लटके हैं
और अधिक ढेले अब मत मारो,
नीचे गिर जायेंगे--

आहिस्ते बोलो !
सुना बहुत शोर और देख चुके साज,
अंतर का शोर कहीं ज्यादा है बाहर से,
गुम्बद में गूंजती आवाजों-सी
मौन संवेदनाएं,
क्षुब्ध यातनाएं
अभी-अभी सोयी हैं
उलझन में थककर
कोरे अल्फाजों से बेधो मत,
आहिस्ते बोलो !
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